बुधवार, 20 सितंबर 2017

द्विवेदी युग की कविता ౼पूर्ण, उपाध्याय, सनेही

द्विवेदी युग कीकविता ౼ पूर्ण, उपाध्याय, सनेही

द्विवेदी युग की सीमा 1900-1920 ई.

मुहम्मद इलियास हुसैन
Hindisahityavimarsh.blogspot.com
Mob : 9717324769

राय देवी प्रसाद पूर्ण (1868-1915 ई.)
काव्य-ग्रंथ : धारादर-धावन (मेघदूत का पद्यानुवाद, 1902 ई.), मृत्युंजय (1904 ई., मृत्यु और ज्ञान पर91 अतुकान्त छन्द), प्रदर्शनी स्वागत (1906 ई., खड़ीबोली के 206 छप्पय). राम-रावण-विरोध (1906 ई., चम्पूकाव्य), स्वदेशी-कुण्डल (1910 ई., देशभक्ति विष.क 52 कुण्डलिया) नए सन् (1910) का स्वागत, मन-मन्दिर, अमलतास, वसन्त वियोग (1912 ई., खड़ीबोली काव्य) आदि।

पं. रामचरित उपाध्याय (1872-1938 ई.)
ब्रजभाषा-काव्य  : विजयी वसन्त, श्रावण श्रृंगार, सपधाशतक का बरवा
खड़ीबोली-काव्य : पवनदूत (1906 ई.), देवसभा, वि.त्र विवाह, राष्ट्र भारती, भव्य भारत, सूक्ति मुक्तावली (1915 ई.), देवदूत (1918 ई.), भारत भक्ति (1919 ई.), रामचरित-चन्द्रिका (1919 ई.), रामचरित-चिन्तामणि (1920 ई., प्रबन्धकाव्य, 25 सर्ग, राम के बचपन से लेकर लव-कुश प्रसंग तक की कथा वर्णित)
रामचरित उपाध्याय की काव्य-पंक्तियाँ
कुशल से रहना है यदि तुम्हें, दनुज, तो फिर गर्व न कीजिए।
शरण में गिरिए रघुनाथ के, निबल के बल केवल राम हैं। अंगद-रावण-संवाद, रामचरित-चिन्तामणि
न्यायपरायण जो नर होगा, उसकी कभी न होगी हार।
कपटी कुटिल कोटि रिपु उसके हो जावेंगे क्षण में छार।
गयाप्रसाद शुक्ल सनेही (1883-1972 ई.)
उपनाम : सनेही, त्रिशूल, तरंगी, अलमस्त
काव्य-ग्रंथ : प्रेम-पचीसी, कृषक क्रन्दन, राष्ट्रीय मंत्र, राष्ट्रीय वीणा, त्रिशूल-तरंग, मानस-तरंग, कला में त्रिशूल, संजीवनी, करुणा कादम्बिनी, करुण भारती, कुसुमांजलि
गयाप्रसाद शुक्ल सनेही  की काव्य-पंक्तियाँ
जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,

वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।

सोमवार, 18 सितंबर 2017

द्विवेदी युग की कविता౼ पाठक, शंकर, द्विवेदी, हरिऔध

द्विवेदी युग की कविता౼पाठक, शंकर, द्विवेदी, हरिऔध


द्विवेदी युग की समय-सीमा  : 1900-1920 ई.
मुहम्मद इलियास हुसैन
Hindisahityavimarsh.blofspot.com
Mob : 9717324769

श्रीधर पाठक (1859-1928 ई.) : काव्य-ग्रन्थ मनोविनोद (पाठक जी की प्रारंभिक रचनाओं का संग्रह तीन खंडों में, क्रमशः 1882, 1905 और 1912 ई. में), एकान्तवासी योगी (1886 ई., गोल्डस्मिथ की रचना हरमिट का खड़ीबोली में काव्यानुवाद, प्रेमाख्यान), जगत सचाई सार (1887 ई., मूल-रचना, जीवन और जगत को सत्य मानकर कर्म करने की प्रेरणा), उजड़ ग्राम (1889 ई., गोल्डस्मिथ के द डिजर्टेड विलेज का ब्रजभाषा में काव्यानुवाद रोला छन्द में ), श्रान्तपथिक (1900 ई., गोल्डस्मिथ की रचना द ट्रैवलर का खड़ीबोली में काव्यानुवाद रोला छन्द में), काश्मीर सुषमा (1904 ई., काश्मीर के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन, ब्रजभाषा में, रोला छन्द में), आराध्य शोकांजलि (1906 ई., पिता की मृत्यु पर), जॉर्ज वन्दना (1911 ई., राजभक्ति का प्रदर्शन), वनाष्टक (1912 ई.), भक्ति विभा (1913 ई.), श्री गोखले प्रशस्ति (1915 ई.), श्री गोखले गुणाष्टक (1915 ई. ब्रजभाषा में, छप्पय छन्द में), देहरादून (1915 ई.), गोपिका गीत (1916 ई.), भारत गीत (1928 ई. देशभक्ति परक गीत)।
श्रीधर पाठक की काव्य-पंक्तियाँ
निजभाषा बोलहु लिखहु पढ़हु गुनहु सब लोग,
करहु सकल विषयन विषैं निज भाषा उपजोग
नाथुराम शर्मा शंकर (1859-1932 ई.) : काव्य-ग्रन्थ अनुराग रत्न, शंकर सरोज, गर्भण्डा रहस्य (प्रबन्धकाव्य, विधवाओं की दुर्दशा और मन्दिरों में होनेवाले दुराचार का वर्णन), शंकर सर्वस्व (1951 ई., गीततावली, कविताकुंज, दोहा, समस्यापूर्ति और विविध रचनाएँ ), शंकर सतसई।
रसिक कुमुद-बन-कलाधर, प्रतिभा आगार।
कविता-कानन-केसरी,  सहृदयता आगार।।
शंकर जी के बारे में महावीर प्रसाद द्विवेदी
यह शंकर जी कौन हैं ? इनकी कविताएँ पढ़कर मैंने अपनी सम्मति बदल दी है और अब मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि खड़ीबोली में भी सुन्दर और सरस कविताएँ हो सकती हैं। सरस्वती-सम्पादक श्री महावीरप्रसाद द्विवेदी को एक पत्र में जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन
राजा लक्ष्मण सिंह ने उन्हें भारत प्रज्ञेन्दु और डॉ. सुधीन्द्र ने खड़ीबोली के कबीर की उपाधि दी थी।   
नाथूराम शर्मा शंकर की काव्य-पंक्तियाँ
काहू विधि विधि की बनावट बचैगी नाहिं
जौ पै वा वियोगिनी की आह कढ़ जाएगी
चौंक चौंक चारों ओर चौकड़ी भरेंगे मृग
खंजन खिलाड़ियों के पंख झड़ जाएँगे।
बोलो इन अँखियों की होड़ करने को अब
कौन से अड़ीले उपमान अड़ जाएँगे ?

महावीरप्रसाद द्विवेदी (1864-1938  ई.) : काव्य-ग्रन्थ मौलिक काव्य : देवी स्तुति शतक (1892 ई., मुक्तक), कान्यकुब्जावलीव्रतम् (1898 ई., मुक्तक), समाचारपत्र सम्पादक स्तवः (1898 ई.), नागरी (1900 ई.), काव्य मंजूषा (1903 ई.), कान्यकुब्ज-अबला-विलाप (1907 ई.), कविता कलाप (1909 ई.), सुमन (1923 ई.), द्विवेदी काव्यमाला (1940 ई.) अनूदित काव्य : विनय विनोद (1889 ई., भर्तृहरि के वैराग्य शतक के दोहों का अनुवाद), विहार वाटिका  (1890 ई., गीतगोविन्द का भावानुवाद), स्नेहलता (1890 ई., भर्तृहरि के श्रृंगार शतक के दोहों का अनुवाद), श्री महिम्न स्त्रोत्र (1891 ई.), गंगालहरी (1891 ई., रत्नाकर की रचना का सवैयों में अनुवाद), ऋतु तरंगिणी (1891 ई., कालिदास के ऋतुसंहार का छायानुवाद), सोहागरात (बाइरन के ब्राइडल नाइट का छायानुवाद), कुमारसंभवसार (1902 ई., कालिदास के कुमारसंभव के प्रथम पांच सर्गों का सारांश)
गद्य और पद्य का पदविन्यास एक ही प्रकार का होना चाहिए।वर्ड्स्वर्थ
नागरी तेरी दशा, अयोध्या विलाप, सरगौ नरक ठिकाना नाहिं (आल्हा छन्द में रचित कल्लू अल्हैत संबंधी रचना),
खंड-काव्य का लघु संस्करण : सूत पंचाशिका, द्रौपदी-वचन-वाणावली, जंबूकी न्याय, टेसू की टांग
वर्णनात्मक प्रबंध : भारत दुर्भिक्ष, समाचारपत्र सम्पादक स्तवः, गर्दभ काव्य, कुमुद सुन्दरी
मुक्क रचनाएँ : देवी स्तुति शतक, कविता कलाप, काव्य मंजूषा, सुमन, द्विवेदी काव्यमाला
महावीरप्रसाद द्विवेदी  की काव्य-पंक्तियाँ
श्रीयुक्त नागरि निहारी दशा तिहारी
होवै विषाद मन माहिं अतीव भारी
इसीलिए हे भवभूति भाविते ,
अभी यहाँ हे कविते, न आ, न आ।
सुरम्यरूपे , रसराशि रंजिते,
विचित्र वर्णाभरणे, कहाँ गई ?
अलौकिकानन्दविधायिनी महा
कवीन्द्रकाते, कविते, अहो कहाँ ?
तुम्हीं अन्नदाता भारत के बैलराज, महाराज।
बिना तुम्हारे हो जाते हम दाना-दाना को मोहताज।

अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध (1865-1946 ई.)
उपाधियाँ : साहित्यरत्न, साहित्यवाचस्पति, कवि सम्राट्
उपनाम : निजामाबाद (आज़मगढ़) के कवि के फहनाम हर सुमेर के अनुकरण पर अपना नाम हरिऔध रखा।
प्रियप्रवास खड़ीबोली का प्रथम महाकाव्य, खड़ीबोली के प्रथम महाकवि ,
काव्य-ग्रंथ : रसिक रहस्य (1899 ई.), प्रेमाम्बुवारिधि  (1900 ई.), प्रेम प्रपंच  (1900 ई.), प्रेमाम्बुप्रश्रवण  (1901 ई.), प्रेमाम्बुप्रवाह (1901 ई.), प्रेम पुष्पहार (1904 ई.), उद्बोधन  (1906 ई.), काव्योपवन (1909 ई.), कर्मवीर  (1916 ई.), ऋतुमुकुर  (1917 ई.), चोखे चौपदे  (1924 ई.), चुभते चौपदे (1924 ई.), पद्य प्रसून (1925 ई.), पद्य प्रमोद  (1927 ई.), बोलचाल (1928 ई.), रसकलश (1931 ई.), फूल-पत्ते (1935 ई.), कल्पलता (1937 ई.), ग्राम-गीत (1938 ई.), बालकवितावली  (1939 ई.), परिऔध सतसई (1940 ई.), मरम स्पर्श (1956 ई.)
ब्रजभाषा-काव्य  : प्रेमाम्बुवारिधि  (1900 ई.), प्रेमाम्बुप्रवाह (1901 ई.), रसकलश (1931 ई., नायिकाभेद संसंधी रचना)
प्रबन्धकाव्य : प्रियप्रवास (1914 ई., 17 सर्गों में श्रीकृष्ण की जीवन-लीला), पारिजात (1936 ई., 15 सर्गों में ) और वैदेही वनवास (1940 ई., 18 सर्गों में राम के द्वारा सीता के निर्वासन की कथा वर्णित)।
हरिऔध की काव्य-पंक्तियाँ
पीर उठे हियरो हमारी टूक टूक होत,
ध्याइ प्राणनाथ जो कसक निज खोती ना। प्रेमाम्बुप्रवाह
रूपोद्यान प्रफुल्लप्राय कलिका राकेन्दुबिम्बाना
तन्वंगी कलहासिनी सुरसिका क्ड़ाकलापुत्तली।।
शोभावारिधि की अमूल्य मणि सी लावण्यलीलामयी।
श्रीराधा मृदुभाषिणी मृगदृगी माधुर्यसन्मर्ति थी। प्रियप्रवास से
जी से प्यारा जगत हित और लोक सेवा जिसे है
प्यारा सच्चा अवनितल में आत्मा त्यागी वही है।प्रियप्रवास से
प्यारी आशा प्रिय मिलन की नित्य है दूर होती
कैसे ऐसे कठिन पथ का पांथ मैं हो रहा हूँ।प्रियप्रवास से
जनक नन्दिनी ने दृग से आते आँसू को रोककर कहा।
प्राणनाथ सब तो सह लूँगी क्यों जाएगा विरह सहा।।
सदा आपका चन्द्रानन अवलोके ही मैं जीती हूँ
रूप-माधुरी-सुधा तृषित वन चकौरिका-सम-पीती हूँ।।वैदेही वनवास से
कथन
मैंने श्रीकृष्णचन्द्र को इस ग्रंथ में एक महापुरुष की भांति अंकित किया है, ब्रह्म करके नहीं।प्रियप्रवास की भूमिका से


शनिवार, 16 सितंबर 2017

खड़ीबोली का विकास


खड़ीबोली परिचय
शाहिद इलियास
शब्दार्थ की दृष्टि से खड़ी बोली हिन्दी का अर्थ हिन्द का होते हुए भी इसका प्रयोग उत्तर भारत के मध्य में बोली जानेवाली भाषा के लिए होता है। खड़ी बोली हिन्दी भारत की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। व्यवहार में यह उस भूभाग की भाषा मानी जाती है. जिसकी सीमा पश्चिम में जैसलमेर, उत्तर-पशिचम में अम्बाला, उत्तर में शिमला से लेकर नेपाल के पूर्वी छोर तक के पहाड़ी प्रदेश, पूर्व में भागलपुर, दक्षिण-पूर्व में रायपुर तथा दक्षिण-पशिचम में खंडवा तक पहुंचती है। इस विशाल भूभाग के निवासियों के साहित्य, पत्र-पत्रिका, शिक्षा-दीक्षा, आपस में वार्तालाप इत्यादि की भाषा खड़ी बोली हिन्दी है, जिसे स्थानीय बोलियों की छाया मिली रहती है। शिष्ट बोलचाल के अतिरिक्त स्कूलों-विद्यालयों में शिक्षा-दीक्षा की भाषा एकमात्र खड़ी बोली है। यह भाषा खड़ी बोली हिन्दी है।
विभिन्न नाम
  खड़ी बोली अनेक नामों से अभिहित की गई है यथाहिंदुई, हिंदवी, दक्खिनी, दखनी या दकनी, रेखता, हिंदोस्तानी, हिंदुस्तानी आदि। डॉ॰ ग्रियर्सन ने इसे वर्नाक्युलर हिंदुस्तानी तथा डॉ॰ सुनीति कुमार चटर्जी ने इसे जनपदीय हिंदुस्तानी का नाम दिया है। डॉ॰ चटर्जी खड़ी बोली के साहित्यिक रूप को साधु हिंदी या नागरी हिंदी के नाम से अभिहित करते हैं। परंतु डॉ॰ ग्रियर्सन ने इसे हाई हिंदी का अभिधान प्रदान किया है।
खड़ीबोली के नाम के आधार
खड़ी बोली शब्द का प्रयोग आरम्भ में उसी भाषा शैली के लिए हुआ, जिसे 1823 ई. के बाद 'हिंदी' कहा गया। किंतु जब प्राचीन या प्रचलित शब्द ने 'खड़ी बोली' का स्थान ले लिया तो खड़ी बोली शब्द उस शैली के लिए बहुत कम प्रयुक्त हुआ, केवल साहित्यिक संदर्भ में कभी कभी प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार जब यह मत प्रसिद्ध हो गया कि हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी की मूलाधार बोली ब्रजभाषा नहीं वरन दिल्ली और मेरठ की जनपदीय बोली है, तब उस बोली का अन्य उपयुक्त नाम प्रचलित ना होने के कारण उसे 'खड़ी बोली' ही कहा जाने लगा। इस प्रकार खड़ी बोली का प्रस्तुत भाषाशास्त्रीय प्रयोग विकसित हुआ। प्राचीन कुरु जनपद से सम्बंध जोड़कर कुछ लोग अब इसे 'कौरवी बोली' भी कहने लगे हैं, किंतु जब तक पूर्णरूप से यह सिद्ध ना हो जाए कि इस बोली का विकास उस जनपद में प्रचलित अपभ्रंश से ही हुआ है तब तक इसे कौरवी कहना वैज्ञानिक दृष्टि से युक्तियुक्त नहीं।
खड़ी बोली बहुल क्षेत्र
खड़ी बोली निम्न लिखित स्थानों के ग्रामीण क्षेत्रों में बोली जाती है- मेरठ, बिजनौर, मुज़फ़्फ़रनगर, सहारनपुर, देहरादून के मैदानी भाग, अम्बाला, कलसिया और पटियाला के पूर्वी भाग, रामपुर और मुरादाबाद। बाँगरू, जाटकी या हरियाणवी एक प्रकार से पंजाबी और राजस्थानी मिश्रित खड़ी बोली ही हैं जो दिल्ली, करनाल, रोहतक, हिसार और पटियाला, नाभा, झींद के ग्रामीण क्षेत्रों में बोली जाती है। खड़ी बोली क्षेत्र के पूर्व में ब्रजभाषा, दक्षिण पूर्व में मेवाती, दक्षिण पश्चिम में पश्चिमी राजस्थानी, पश्चिम में पूर्वी पंजाबी और उत्तर में पहाड़ी बोलियों का क्षेत्र है।
बिहार, झारखण्ड, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश एवं हरियाणा हिंदी (खड़ी बोली) भाषाभाषी राज्य हैं। दूसरे शब्दों में, खड़ी बोली हिन्दी पश्चिम में जैसलमेर, उत्तर-पशिचम में अम्बाला, उत्तर में शिमला से लेकर नेपाल के पूर्वी छोर तक के पहाड़ी प्रदेश, पूर्व में भागलपुर, दक्षिण-पूर्व में रायपुर तथा दक्षिण-पशिचम में खंडवा तक बोली जाती है। भारत के बाहर (म्यांमार, लंका, मॉरिशस, ट्रिनिडाड, फीजी, मलाया, सूरीनाम, दक्षिण और पूर्वी अफ़्रीक़ा) भी हिन्दी बोलनेवालों की संख्या काफ़ी है।
उदभव और विकास
हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत विस्तृत व प्राचीन है। हिन्दी भाषा के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में प्रचलित धारणाओं पर विचार करते समय हमारे सामने हिन्दी भाषा की उत्पत्ति का प्रश्न दसवीं शताब्दी के आसपास की प्राकृताभास भाषा तथा अप्रभंश भाषाओं की ओर जाता है। अपभ्रंश शब्द की व्युत्पत्ति और जैन रचनाकारों की अपभ्रंश कृतियों का हिन्दी से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए जो तर्क और प्रमाण हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थों में प्रस्तुत किये गये हैं उन पर विचार करना भी आवश्यक है। सामान्यतः प्राकृत की अन्तिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी साहित्य का आविर्भाव स्वीकार किया जाता है। उस समय अपभ्रंश के कई रूप थे और उनमें सातवीं-आठवीं शताब्दी से ही पद्य रचना प्रारम्भ हो गयी थी।
साहित्य की दृष्टि से पद्यबद्ध जो रचनाएँ मिलती हैं वे दोहा रूप में ही हैं और उनके विषय, धर्म, नीति, उपदेश आदि प्रमुख हैं। राजाश्रित कवि और चारण नीति, श्रृंगार, शौर्य, पराक्रम आदि के वर्णन से अपनी साहित्य-रुचि का परिचय दिया करते थे। यह रचना-परम्परा आगे चलकर शैरसेनी अपभ्रंश या प्राकृताभास हिन्दी में कई वर्षों तक चलती रही। पुरानी अपभ्रंश भाषा और बोलचाल की देशी भाषा का प्रयोग निरन्तर बढ़ता गया। इस भाषा को विद्यापति ने देसी भाषा कहा है, किन्तु यह निर्णय करना सरल नहीं है कि हिन्दी शब्द का प्रयोग इस भाषा के लिए कब और किस देश में प्रारम्भ हुआ। हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि प्रारम्भ में हिन्दी शब्द का प्रयोग विदेशी मुसलमानों ने किया था। इस शब्द से उनका तात्पर्य भारतीय भाषा का था। खुसरो ने विक्रम की चौदहवीं शताब्दी में ही ब्रजभाषा के साथ साथ खालिस खड़ी बोली में कुछ पद्य और पहेलियाँ बनाई थीं। ... अकबर के समय में गंग कवि ने 'चंद छंद बरनन की महिमा' नामक एक गद्य पुस्तक खड़ी बोली में लिखी थी।
राहुल सांकृत्यायन खड़ी बोली हिन्दी का उद्भव काल 7वीं शताब्दी मानते हैं। यही मत चन्द्रधर शर्मा गुलेरी का भी है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल स्वतंत्र बोलचाल की भाषा से मानते हैं। आचार्य हज़ारी प्रसाद भी इसी मत के हैं।
उपबोलियां
खड़ी बोली हिन्दी की पांच उपभाषाएं और अठारह बोलियां शामिल हैं
उपभाषाएँ          बोलियाँ
1.       पश्चिमी हिन्दी           ख़ड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, बुन्देली, हरियाणवी (बाँगरू), कन्नौजी।                                                  
2.       पूर्वी हिन्दी                अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।
3.       राजस्थानी                मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी।
4.       पहाड़ी                     गढ़वाली, कुमायुंनी, नेपाली।
5.       बिहारी                    मैथिला, मगही, भोजपुरी।
साहित्य
खड़ी बोली गद्य के आरम्भिक रचनाकारों में फ़ोर्ट विलियम कॉलेज के बाहर दो रचनाकारोंसदासुख लाल 'नियाज' (सुखसागर) व इंशा अल्ला ख़ाँ (रानी केतकी की कहानी) तथा फ़ोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता के दो भाषा मुंशियोंलल्लू लालजी (प्रेम सागर) व सदल मिश्र (नासिकेतोपाख्यान) के नाम उल्लेखनीय हैं। भारतेन्दु पूर्व युग में मुख्य संघर्ष हिंदी की स्वीकृति और प्रतिष्ठा को लेकर था। इस युग के दो प्रसिद्ध लेखकोंराजा शिव प्रसाद 'सितारे हिन्द' व राजा लक्ष्मण सिंह ने हिंदी के स्वरूप निर्धारण के सवाल पर दो सीमान्तों का अनुगमन किया। राजा शिव प्रसाद ने हिंदी का गँवारुपन दूर कर उसे उर्दूमुअल्ला बना दिया तो राजा लक्ष्मण सिंह ने विशुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिंदी का समर्थन किया।
इन दोनों के बीच सर्वमान्य हिंदी गद्य की प्रतिष्ठा कर गद्य साहित्य की विविध विधाओं का ऐतिहासिक कार्य भारतेन्दु युग में हुआ। हिंदी सही मायने में भारतेन्दु के काल में 'नई चाल में ढली' और उनके समय में ही हिंदी के गद्य के बहुमुखी रूप का सूत्रपात हुआ। उन्होंने न केवल स्वयं रचना की बल्कि अपना एक लेखक मंडल भी तैयार किया, जिसे 'भारतेन्दु मंडल' कहा गया। भारतेन्दु युग की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि गद्य रचना के लिए खड़ी बोली को माध्यम के रूप में अपनाकर युगानुरूप स्वस्थ दृष्टिकोण का परिचय दिया। लेकिन पद्य रचना के मसले में ब्रजभाषा या खड़ी बोली को अपनाने के सवाल पर विवाद बना रहा, जिसका अन्त द्विवेदी के युग में जाकर हुआ।
खड़ी बोली और हिंदी साहित्य के सौभाग्य से 1903 ई. में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' पत्रिका के सम्पादन का भार सम्भाला। वे सरल और शुद्ध भाषा के प्रयोग के हिमायती थे। वे लेखकों की वर्तनी अथवा त्रुटियों का संशोधन स्वयं करते चलते थे। उन्होंने हिंदी के परिष्कार का बीड़ा उठाया और उसे बख़ूबी अंजाम दिया। गद्य तो भारतेन्दु युग से ही सफलतापूर्वक खड़ी बोली में लिखा जा रहा था, अब पद्य की व्यावहारिक भाषा भी एकमात्र खड़ी बोली प्रतिष्ठित होनी लगी। इस प्रकार ब्रजभाषा, जिसके साथ में 'भाषा' शब्द जुड़ा हुआ है, अपने क्षेत्र में सीमित हो गई अर्थात् 'बोली' बन गई। इसके मुक़ाबले में खड़ी बोली, जिसके साथ 'बोली' शब्द लगा है, 'भाषा बन गई', और इसका सही नाम हिंदी हो गया। अब खड़ी बोली दिल्ली के आसपास की मेरठजनपदीय बोली नहीं रह गई, अपितु यह समस्त उत्तरी भारत के साहित्य का माध्यम बन गई। द्विवेदी युग में साहित्य रचना की विविध विधाएँ विकसित हुई।। महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्याम सुन्दर दास, पद्म सिंह शर्मा, माधव प्रसाद मिश्र, पूर्णसिंह, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी आदि के अवदान विशेषतः उल्लेखनीय हैं।
साहित्यिक खड़ी बोली के विकास में छायावाद युग का योगदान काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी वर्मा और राम कुमार आदि ने महती योगदान किया। इनकी रचनाओं को देखते हुए यह कोई नहीं कह सकता कि खड़ी बोली सूक्ष्म भावों को अभिव्यक्त करने में ब्रजभाषा से कम समर्थ है। हिंदी में अनेक भाषायी गुणों का समावेश हुआ। अभिव्यजंना की विविधता, बिंबों की लाक्षणिकता, रसात्मक लालित्य छायावाद युग की भाषा की अन्यतम विशेषताएँ हैं। हिंदी काव्य में छायावाद युग के बाद प्रगतिवाद युग, प्रयोगवाद युग आदि आए। इस दौर में खड़ी बोली का काव्य भाषा के रूप में उत्तरोत्तर विकास होता गया।
विशेषताएँ
खड़ी बोली हिन्दी भी अन्य भारतीय भाषों की तरह संस्कृत पर आधारित है, पर इसने संस्कृत का अंधानुकरण नहीं किया है। इसकी अपनी प्रकृति है। इसने संस्कृत वर्णमाला और उच्चरण को अपनाया है और संस्कृत की अधिकतर ध्वनियों को ग्रहण किया है।
यह देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। इसमें ध्वनि प्रतीकोंस्वर और व्यंजन का क्रम वैज्ञानिक है। स्वरों में ह्रस्व-दीर्घ के लिए अलग-अलग मात्राएँ हैं और स्वरों की मात्राएँ निश्चित हैं। अल्पप्राण और महाप्राण ध्वनियों के अलग-अलग लिपि-चिह्न हैं। जैसे क अल्पप्राण और ख महाप्राण ध्वनि। इसमें पहले जिन ध्वनियों के लिए चिह्न नहीं थे, उन्हें बाद में बना लिया गया है। जैसे क़, ख़, ग़, ज़, फ़, ऍ, ऑ इत्यादि। इसमें तीन संयुक्त व्यंजन हैंश्र, त्र और ज्ञ। इनके अतिरिक्त कुछ औऱ भी आवश्यक व्यंजन गढ़ लिए गए हैं। जैसे ड़, ढ़। इसमें वर्णों के नाम उच्चारण के अनुरूप हैं। यहां जो वर्ण जैसा है, उसका सामान्य उच्चारण वैसा ही होता है। इसमें हर ध्वनि के लिए अलग चिह्न हैं। एक ध्वनि के लिए एक ही चिह्न इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। हिन्दी भाषा जिस रूप में बोली जाती है, उसी रूप में आम तौर पर लिखी जाती है।  
महत्व
संसार में कुल मिलाकर क़रीब 2800 भाषाएँ हैं, जिलमें तेरह ऐसी भाषाएँ हैं, जिलके बोलनेवालों की संख्या साठ करोड़ से अधिक है। संसार की  भाषाओं में हिन्दी को तीसरी स्थान प्राप्त है। इसके बोलनेवालों की संख्या तीस करोड़ से अधिक है।
खड़ी बोली हिन्दी हमारे देश की एक जीवित और सशक्त भाषा है। हमारे देश में यह युग-युग से विचार-विनिमय का माध्यम रही है। इसने बहुत-से देशी-विदेशी शब्दों, मुहावरों, कहावतों और अन्य भाषाओं की अनेक ध्वनियों को अपनाया और अपने शब्द-भंडार और अपनी अभिव्यक्ति को समृद्ध किया है। यह सरल भाषा है, इसलिए दिन-प्रतिदिन इसका प्रचार-प्रसार बढ़ता जा रहा है।

निष्कर्ष  यह कि हिन्दी ने देशी-विदेशी अनेक शब्दों को ग्रहण कर और अपने परिवार की अनेक बोलियों और अन्य भा।ओं के प्रभावकारी तत्वों और शक्तियों को मिलाकर एक ऐसी परिष्कृत खड़ी बोली का शानदार रूप गठित किया है जो आज राष्ट्रभाषा का गौरव बन गई है।