शुक्रवार, 30 मई 2014

परमानन्द श्रीवास्तव (1935-2013) की रचनाएं

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परमानन्द श्रीवास्तव (1935-2013) की रचनाएं

 

10 फरवरी 1935, ग्राम बाँसगाँव, ज़िला गोरखपुर, 5 नवम्बर 2013 गोरखपुर।

प्रकाशित कृतियाँ

• आलोचना

 हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया (1965)

 नई कविता का परिप्रेक्ष्य (1968)

 कवि कर्म और काव्यभाषा (1975)

उपन्यास का यथार्थ, रचनात्मक भाषा (1976)

 जैनेन्द्र के उपन्यास (1977)

 समकालीन कविता का व्याकरण (1980)

जायसी (1981)

निराला (1985)

 शब्द और मनुष्य (1988)

समकालीन कविता का यथार्थ (1988)

उपन्यास का पुनर्जन्म (1995)

 कविता का अर्थात् (1999)

कविता का उत्तरजीवन (2004)

 अँधेरे कुएँ से आवाज़ (2005)

दूसरा सौन्दर्यशास्त्र क्यों (2005)

सन्नाटे में बारिश (2008)

अँधेरे में शब्द (2009)

उततर समय में साहित्य (2010)

प्रति की संस्कृति और साहित्य (2011)

उपन्यास के विरुद्ध उपन्यास (2012)

आलोचना की संस्कृति (2013)

• कविता संग्रह 

 उजली हँसी के छोर पर (1960)

अगली शताब्दी के बारे में (1981)

चौथा शब्द (1993)

एक अनायक का वृतान्त (2004)।

• कहानी संग्रह

 रुका हुआ समय (2005)।)

• डायरी

 एक विस्थापित की डायरी (2005)

• निबन्ध

अँधेरे कुएँ से आवाज़ (2005)

•पत्रकारिता 

 आलोचना (पत्रिका), इससे पहले अनियकालीन पत्रिका ‘साखी’ का भी उन्होंने संपादन किया था।

सम्मान व पुरस्कार

• व्यास सम्मान - वर्ष 2006 में,

• भारत भारती पुरस्कार - 2006 में।

• उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया ।

मंगलवार, 27 मई 2014

नन्ददुलारे वाजपेयी (1906—21 अगस्त, 1967) की रचनाएं/Nandadulare Vajpeyee ki Rachnayen

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नन्ददुलारे वाजपेयी (190621 अगस्त, 1967) की रचनाएं/Nandadulare Vajpeyee ki Rachnayen


शुक्लोत्तर युग के प्रख्यात प्रभाववादी समीक्षक । वाजपेयी जी ने ‘प्रयोगवाद को बैठे-ठाले का धंधा कहा है।

आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी जी

1. हिन्दी साहित्य बीसबी शाताब्दी (1940, प्रथम कृति)
.2. जयशंकर प्रसाद (1940)
3. प्रेमचन्द्रएक साहित्यिक विवेचन
4.  आधुनिकसाहित्य (1950)
5.  नया साहित्य :  नए प्रश्न (1955)
2.  महाकविसूरदास
5. कवि निराला (1965)
7. नई कविता (1976)
8. कवि सुमित्रनन्द पंत (1976)
9. रस सिद्धान्त नए संदर्भ (1977)
10. साहित्य का आधुनिक युग (1978)
11. आधुनिक साहित्य सृजन और समीक्षा (1978)
12. रीति और शैली (1979)
13. रचनावली 8 खण्डों में
14. भुलक्कडों का देश (व्यंग्य लेख)
15. हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास
16. राष्ट्रीय साहित्य
17. प्राश्चात्य सौदर्य शास्त्र का इतिहास
18. और यादे बोल उठीं (संस्मरण)

रविवार, 25 मई 2014

अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (1865-1947) की रचनाएं/Ayodhya Singh Upadhyay 'Hariaudh' ki Rachnayen


अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (1865-1947)  की रचनाएं/Ayodhya Singh Upadhyay 'Hariaudh' ki Rachnayen

(15 अप्रैल, 1865-16 मार्च, 1947, निजामाबाद, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश)

 

प्रियप्रवास हरिऔध जी का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह हिंदी खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है। इसे मंगलाप्रसाद पुरस्कार (1938) प्राप्त हो चुका है। इस प्रकार खड़ी बोली का प्रथम महाकवि होने का श्रेय 'हरिऔध' जी को है।

 


1899  ई. 'रसिक रहस्य'

1900 ई. 'प्रेमाम्बुवारिधि', 'प्रेम प्रपंच'

1901 ई. 'प्रमाम्बु प्रश्रवण', 'प्रेमाम्बु प्रवाह'

1904 ई. 'प्रेम पुष्पहार'

1906 ई. 'उदबोधन'

1909 ई. 'काव्योपवन'

1916 ई. 'कर्मवीर'

1917 ई. 'ऋतु मुकुर'

1925 ई. 'पद्मप्रसून'

1927 ई. 'पद्मप्रमोद'

1932 ई. 'चोखेचौपदे'

 'चुभते चौपदे'

 रसकलश




 मर्मस्पर्श

 पवित्र पर्व

 दिव्य दोहावली

 हरिऔध सतसई



उपन्यास : 'प्रेमकान्ता' (1894), ठेठ हिन्दी का ठाठ या देवबाला (1899), अधखिला फूल (1907)


संपादन : कबीर वचनावली (1917)

ललित निबंध : संदर्भ सर्वस्व


आत्मकथात्मक गद्य  : इतिवृत्त

पुरस्कार/सम्मान

1922  हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति (1922)

1934  हिंदी साहित्य सम्मेलन के चौबीसवें अधिवेशन (दिल्ली, 1934) के सभापति

1937  12 सितंबर 1937 ई. को नागरी प्रचारिणी सभा, आरा की ओर से राजेंद्र 1937  प्रसाद   द्वारा अभिनंदन ग्रंथ भेंट (12 सितंबर 1937)

1938  'प्रियप्रवास' पर मंगला प्रसाद पुरस्कार


प्रियप्रवास में पुत्र-वियोग में व्यथित यशोदा का करुण चित्र देखिए

प्रिय प्रति वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है?
दुःख जल निधि डूबी का सहारा कहाँ है?
लख मुख जिसका मैं आजलौं जी सकी हूँ।
वह ह्रदय हमारा नैन तारा कहाँ है?

हरिऔध जी ने कृष्ण को ईश्वर रूप में न दिखा कर आदर्श मानव और लोक-सेवक के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने स्वयं कृष्ण के मुख से कहलवाया है
विपत्ति से रक्षण सर्वभूत का,
सहाय होना असहाय जीव का।
उबारना संकट से स्वजाति का,
मनुष्य का सर्व प्रधान धर्म है।

राधा का अपने प्रियतम कृष्ण के वियोग का दुख सह कर भी लोक-हित की कामना करती हैं
प्यारे जीवें जग-हित करें, गेह चाहे न आवें।

कृष्ण के वियोग में ब्रज के वृक्ष भी रोते हैं
फूलों-पत्तों सकल पर हैं वादि-बूँदें लखातीं,
रोते हैं या विपट सब यों आँसुओं की दिखा के।

संध्या का एक सुंदर दृश्य देखिए
दिवस का अवसान समीप था,
गगन था कुछ लोहित हो चला।
तरु शिखा पर थी जब राजती,
कमलिनी-कुल-वल्लभ का प्रभा।

राधा का रूप-वर्णन करते समय उनकी भाषा देखिए
रूपोद्याम प्रफुल्ल प्रायः कलिका राकेंदु-बिंबानना,
तन्वंगी कल-हासिनी सुरसि का क्रीड़ा-कला पुत्तली।
शोभा-वारिधि की अमूल्य मणि-सी लावण्य लीलामयी,
श्री राधा-मृदु भाषिणा मृगदगी-माधुर्य की मूर्ति थी।

चौपदों की भाषा इसी प्रकार की है
नहीं मिलते आँखों वाले, पड़ा अंधेरे से है पाला।
कलेजा किसने कब थामा, देख छिलते दिल का छाला।।

कहें क्या बात आंखों की, चाल चलती हैं मनमानी
सदा पानी में डूबी रह, नहीं रह सकती हैं पानी
लगन है रोग या जलन, किसी को कब यह बतलाया
जल भरा रहता है उनमें, पर उन्हें प्यासी ही पाया


श्री सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के शब्दों में हरिऔध जी का महत्व और अधिक स्पष्ट हो जाता है-
'इनकी यह एक सबसे बड़ी विशेषता है कि ये हिंदी के सार्वभौम कवि हैं। खड़ी बोली, उर्दू के मुहावरे, ब्रजभाषा, कठिन-सरल सब प्रकार की कविता की रचना कर सकते हैं।

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शनिवार, 24 मई 2014

सुमित्रानंदन पंत (1900-1977) की रचनाएँ/Sumitranandan Pant ki Rachnayen


सुमित्रानंदन पंत (1900-1977)   की रचनाएँ/Sumitranandan Pant ki Rachnayen

(20 मई 190028 दिसम्बर 1977)

पहली कविता : गिरजे का घंटा (1916)

कविता संग्रह / खंडकाव्य


चुनी हुई रचनाओं के संग्रह


काव्य-नाटक/काव्य-रूपक

  • ज्योत्ना (1934)
  • रजत-शिखर (1951)
  • शिल्पी (1952)

आत्मकथात्मक संस्मरण

  • साठ वर्ष : एक रेखांकन (1963)

आलोचना

  • गद्यपथ (1953)
  • शिल्प और दर्शन (1961)
  • छायावाद : एक पुनर्मूल्यांकन (1965)

कहानियाँ

  • पाँच कहानिय़ाँ (1938)

उपन्यास

  • हार  (1960)

अनूदित रचनाओं के संग्रह


संयुक्त संग्र


पत्र-संग्रह

  • पंत के सौ पत्र (1970, सं. बच्चन)

पत्रकारिता

  • 1938 में उन्होंने रूपाभ नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला।

कुछ प्रतिनिधि रचनाएँ 

उच्छ्वास, आँसी की बालिका, पर्वत प्रदेश में पावस, काले बादल, छाया, नौका-विहार, परिवर्तन, भावी पत्नी के प्रति, अनंग, चाँदनी, अप्सरा, द्रुत झरो, धेनुएँ.


पुरस्कार व सम्मान


1960 कला और बूढ़ा चांद पर साहित्य अकादमी पुरस्कार

1961 पद्मभूषण हिंदी साहित्य की इस अनवरत सेवा के लिए

 1968 चिदम्बरा नामक रचना पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार

लोकायतन पर 'सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार'
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